Sunday, May 01, 2011

निटी के दीक्षांत समारोह को समर्पित:

लडखडाता हूँ, गिरता संभलता  हूँ,
दोस्तों के बिना पोंड का चक्कर लगाने में वक़्त तो लगता है |
जो हिलाता था बालों को MDP की छत पर
उस हवा के झोंकें को आने में वक़्त तो लगता है |
वो रोबोट की अदाएं, वो चिल्लाना बाबा का,
लिम्जे के छोटे थे जो बाल, उनको आज सुलझाने में वक़्त तो लगता है |
चिंता की जब कोई बात नहीं होती थी,
आज तो माथे की शिकन मिटने में वक़्त तो लगता है |
बकर में छु आते थे तारे, घूम लेते थे जहाँ,
आज तो ऑफिस जाने में भी वक़्त तो लगता है  |
meetings में भारी हो जाती है पलकें, आती है झमाहिया,
वो lecture  में सोने की आदत भुलाने में वक़्त तो लगता है |
जो फिसलता था हर एक हसीना पर,
आज उस दिल में अरमान जगाने में वक़्त तो लगता है |
न होगी वो रात की चाय, न होंगे वो दोस्त,
वक़्त को खुद को दोहराने में वक़्त तो लगता है |
टीस उठती है तो बह जाने दो आंसू,
तेरे बिना ऐ मेरे दोस्त उनको आने में भी वक़्त तो लगता है |
हंस ले ऐ आस्मां चूमेंगे तुझे भी एक दिन,
अंडे से बहार निकले चूजे के पंख आने में वक़्त तो लगता है |

5 comments:

  1. waah waah... kya baat hai :)

    ReplyDelete
  2. best of kulfiwala's...
    shaaaandar and jaaandar

    ReplyDelete
  3. shabbash mere sher :) ghar dhoondhne mein bhi bahut waqt lagta hai waise... :P

    ReplyDelete
  4. kya baat likh daali..
    nitie ki saari yaadein khod-khod kar nikal daali...
    mast hai!

    ReplyDelete