Thursday, September 23, 2010

दूसरा वनवास- Kaifi Azmi

राम बनवास से जब लौट के घर आये,
याद जंगल बहुत आया जो नगर मैं आये;
रक्से दीवानगी आंगन मैं जो देखा होगा,
6 दिसम्बर को श्री राम ने सोचा होगा|
इतने दीवाने कहाँ से मेरे घर मैं आये,
जगमगाते थे जहाँ राम के क़दमों के निशान
प्यार की कहकशां लेते थे अंगारे जहाँ,
मोड़ नफरत के उसी रहगुजर मैं आये|
धरम क्या उनका, क्या जात है, यह जनता कौन?
घर न जलता तो उन्हें रात मैं पहचानता कौन?
जलती मशाल लिए जो लोग नज़र आये,
शाकाहारी है मेरे दोस्त तुम्हारा खंजर
तुमने बाबर की ओर फेंके थे सारे पत्थर,
है मेरे सर की खता जो सर मैं आये
पाँव सरजू मैं अभी राम ने धोये भी न थे,
की नज़र आये वहां खून के गहरे धब्बे,
पाँव धोये बिना सरयू के किनारे से उठे
राम ये कहते हुए अपने दुआरे से उठे,
राजधानी की फिजा आई नहीं रास मुझे,
6 December को मिला दूसरा वनवास मुझे|

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