लम्हों की lawn पर;
नंगे पैर उनपर चलते चलते
इतनी दूर चले आये है,
की भूल गए है जुटे कहाँ उतारे थे!
एडी कोमल थी जब आये थे,
थोड़ी सी नाजुक है अब भी;
और नाजुक ही रहेगी,
इन खट्टी मीठी यादों की शरारत
जब तक इन्हें गुदगुदाती रहे|
सच भूल गए है जुटे कहाँ उतारे थे,
पर लगता है अब उनकी जरुरत नहीं|
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