गर्मी उतनी ही है बदन जलाती;
ये कोहरा न इतना धुंधलाता,
मेरे हमसफ़र जो तुम साथ होते!
तोड़ लाता मैं नभ के तारे,
और चाँद पर घर बसाता;
कल्पनाओं को मैं पर लगता,
मेरे हमसफ़र जो तुम साथ होते!
यूँ तो डगमगा के चलता था
जिंदगी की कठिन राहों पर;
सरल पथों पर न लडखडाता,
मेरे हमसफ़र जो तुम साथ होते!
हंसी से जोड़ता मैं रिश्ता,
ग़मों को भी मैं गले लगता;
प्यार को मैं घर बुलाता,
मेरे हमसफ़र जो तुम साथ होते!
क्या ये दुनिया, क्या समाज ,
क्या मदीना, क्या ये काबा;
खुदा से सीधा नजर मिलाता,
मेरे हमसफ़र जो तुम साथ होते!
0 comments:
Post a Comment