Wednesday, July 21, 2010

हमसफ़र

सर्दी ठिठुराती है अब भी उतनी,
गर्मी उतनी ही है बदन जलाती;
ये कोहरा न इतना धुंधलाता,
मेरे हमसफ़र जो तुम साथ होते!


तोड़ लाता मैं नभ के तारे,
और चाँद पर घर बसाता;
कल्पनाओं को मैं पर लगता,
 मेरे हमसफ़र जो तुम साथ होते!
यूँ तो डगमगा के चलता था 
जिंदगी की कठिन राहों पर;
सरल पथों पर न लडखडाता,
मेरे हमसफ़र जो तुम साथ होते!

हंसी से जोड़ता मैं रिश्ता,
ग़मों को भी मैं गले लगता;
प्यार को मैं घर बुलाता,
मेरे हमसफ़र जो तुम साथ होते!

क्या ये दुनिया, क्या समाज ,
क्या मदीना, क्या ये काबा;
खुदा से सीधा नजर मिलाता,
मेरे हमसफ़र जो तुम साथ होते!

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