Monday, February 22, 2010

फैशन

उतरे कपडे हुआ नंगा बदन,
फिर हुआ नैतिकता का पतन;
तो बना वह,
जिसे लोग कहते है fashion|

एक बार हम
फैशन शो देखने पहुंचे;
शो के बहाने आँखों को
सेंकने पहुंचे|

एक युवती
पहने हुए थे जालीदार साडी;
लगता था मनो supply
कर गया था उसे कबाड़ी|

आयोजक बोला,
देखो ये साडी बहुत काम आती है;
दखने से ज्यादा ये
बदन को दिखाती है;
इसकी जलियाँ मछर के
साथ साथ आशिक भी फसाती है|

इसके बाद एक बाला,
ऐसे कपडे उतार के आई,
की हमारी नजर शर्म
से झुक गयी;
पर औरों की नजर,
उसपर ही रुक गयी|

अर्धनग्न शारीर था,
अधखुली थी काया;
लगता था इश्वर ने उसे,
नग्न रहने के लिए ही बनाया|

भाई ये वस्त्रों का प्रदर्शन है,
या अधोवस्त्रों का;
हमने आयोजक से ऐसा पूछा,
तो उसे कुछ न सुझा|

तपककर बोला फैशन महान है,
देश की रक्षा मैं फैशन का
बहुत महती योगदान है|

सोचो जरा देश की आबादी के लिए
वस्त्र कहाँ से लायेंगे?
और अगर ले आये तो
सेना के अस्त्र शास्त्र कहाँ से लायेंगे?

शो भर हमारे मनन मैं,
उठता रहा ये सवाल;
प्रदर्शन तो कपड़ों का है,
फिर सब क्यूँ दिखा रहे है खाल?

क्या होता है,
किसे कहते है फैशन;
अब तो दिमाग मैं है
बस यही टेंशन|

-- कुलदीप सिंह

3 comments:

  1. kully tu maanega nahi....
    but kya likha hai yaar.. awesome ...
    aise hi social issue utha kar likhne se logon mein awaremess jagao..

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  2. fundu kullu...
    naye yug ka kavi...

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